छत्तीसगढ़ में जनसंख्या की वृद्धि एवं संरचना
डॅा नुदरत परवीन
सहायक प्राध्यापक, एन. डी. आर. महाविद्यालय, बिलासपुर
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू
किसी देश की जनसंख्या वृद्धि का अध्ययन जनांकिकी दृष्टिकोण के अतिरिक्त देश के आर्थिक विकास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या वृद्धि दर देश की औसत जनसंख्या वृद्धिदर 17.70 प्रतिशत से अधिक है। राज्य के 16 जिलों में से 05 जिलों की जनसंख्या वृद्धि दर देश के औसत जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक है। शेष 11 जिलों में जनसंख्या वृद्धि दर देश के औसत जनसंख्या वृद्धि दर से कम है। किसी भी देश के आर्थिक विकास एवं जनसंख्या की वृद्धि में उस देश का लैंगिक गठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जनसंख्या का व्यावसायिक वितरण एवं आर्थिक विकास के मध्य गहरा संबंध होता है। जनसंख्या के व्यावसायिक विभाजन के आधार पर किसी देश की आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन किया जा सकता है।
1 छत्तीसगढ़ में जनसख्ंया की वृद्धि:
छत्तीसगढ़ भारत के हृदय प्रदेश में स्थित है। यह राज्य अनेक नदियों, कृषि योग्य भूमि, वन, खनिज तथा अन्य प्राकृतिक साधनों की दृष्टि से समृद्ध है। छत्तीसगढ़ आर्थिक एवं सामाजिक रूप से तीव्र गति से विकास कर रहा है। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या भारत के अनेक राज्यों के जनसंख्या की तुलना में कम है। यह एक विकासशील राज्य है। यहाँ की जनसंख्या मुख्यतः कृषि पर निर्भर है। जी.सी. व्हीपल के अनुसार - ’’एक राष्ट्र की वास्तविक संपत्ति उसकी भूमि एवं जल में नहीं, ना ही जंगलों एवं खदानों में, ना ही झंुड एवं समूहों में और ना ही डाॅलर में है, अपितु यह इसके स्वस्थ व खुशहाल उत्साही एवं नैतिक रूप से चुस्त लोगों में है।’’
छत्तीसगढ़ प्रदेश की 2001 की जनगणना की तुलना में वर्ष 2011 की जनगणना में जनसंख्या वृद्धि दर 21.61 प्रतिशत है।
किसी दिये हुये दो समयों पर उपलब्ध जन्म दर तथा देशान्तर के आधार पर जनसंख्या वृद्धि को ज्ञात किया जाता है तथा इन्हीं समंकों के आधार पर जनसंख्या वृद्धि की दर की गणना की जाती है। किसी देश की जनसंख्या वृद्धि का अध्ययन जनांकिकी दृष्टिकोण के अतिरिक्त देश के आर्थिक विकास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या वृद्धि दर देश की औसत जनसंख्या वृद्धिदर 17.70 प्रतिशत से अधिक है। राज्य के 16 जिलों में से 05 जिलों की जनसंख्या वृद्धि दर देश के औसत जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक है। शेष 11 जिलों में जनसंख्या वृद्धि दर देश के औसत जनसंख्या वृद्धि दर से कम है।
जिलानुसार जनसंख्या में होने वाले दशकीय वृद्धि में अस्थिरता अथवा उच्चावचन की माप हेतु विचरण गुणांक की गणना की गई जिससे यह ज्ञात हुआ कि वर्ष 1981-91 के दौरान विभिन्न जिलों के मध्य जनसंख्या वृद्धि में सर्वाधिक परिवर्तशीलता (38.2857 प्रतिशत) रहा, जबकि वर्ष 1991-2001 के दौरान यह परिवर्तनशीलता न्यूनतम (21.2993 प्रतिशत) पाई गई।
2 लिंगानुपात:
किसी भी देश के आर्थिक विकास एवं जनसंख्या की वृद्धि में उस देश का लैंगिक गठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सामान्यतया यह देखा गया है कि पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों में कार्य करने की शारीरिक क्षमता कम होती है, अतः वे उत्पादन के कार्यों में उतना हाथ नहीं बटाती हैं जितना कि उपभोग में बटाती हैं, जिससे प्रति व्यक्ति आय सामान्यतया कम रहती है। अन्य शब्दों में किसी देश की प्रति व्यक्ति आय इस बात पर भी निर्भर करती है कि वहां की स्त्री- जनसंख्या उत्पादन में कितना हाथ बटाती है। इसी तरह, जिस देश में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या अधिक होती है, वहां जनसंख्या वृद्धि दर की संभावना अधिक रहती है। इसके विपरीत, स्त्रियों की संख्या पुरूषों से कम होने पर समाज में वेश्यावृत्ति, व्यभिचार, बलात्कार तथा समलैंगिकता आदि सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा मिलता है। इससे मनुष्य का नैतिक पतन हो जाता है तथा अनेक जटिल यौन रोग उत्पन्न हो जाते है। इसके अतिरिक्त पुरूषों की संख्या अधिक रहने से बाल-विवाह प्रथा को प्रोत्साहन मिलता है। बाल विवाह के कारण पति-पत्नि की आयु में काफी अन्तर हो जाता है जो वैधव्य का कारण बनता है।
लिंग अनुपात किसी विशिष्ट समय पर किसी देश, स्थान, जाति विशेष के उस अनुपात को दर्शाता है जो कि उस समय के पुरूषों की संख्या तथा स्त्रियों की संख्या के बीच पाया जाता है। लिंग-अनुपात के द्वारा किसी देश की श्रम-संरचना, विवाह की आयु तथा राष्ट्रीय आय के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
लिंगानुपात सामाजिक जीवन की प्रक्रिया को कई प्रकार से प्रभावित करता है। लिंगानुपात जनांकिकीय तत्वों जैसे विवाह, जन्म दर, मृत्यु दर आदि को प्रभावित करने के साथ ही साथ जनांकिकीय तत्वों जैसे यृद्ध, प्रवास, व्यवसाय आदि पर भी देखने को मिलता है जिनके कारण लिंगानुपात में असन्तुलन उत्पन्न होता है। असन्तुलित लिंगानुपात हमारे आर्थिक तथा सामाजिक जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है। छोटी जातियों तथा जनजातियों में स्त्रियों के द्वारा तलाक दिया जाना एक आम बात है। इसका कारण स्त्रियों की तुलना में पुरूषों की संख्या का अधिक होना है।
यदि किसी देश में जन्म तथा मृत्यु दरें दोनों ही ऊँची है तब वहां लिंगानुपात सम होगा, अर्थात् स्त्रियों तथा पुरूषों की संख्या बराबर होगी। यदि दोनों जन्म तथा मृत्यु दरें कम होगी तब वयस्कों तथा अधिक आयु के व्यक्तियों की संख्या अधिक होने के अतिरिक्त स्त्रियों की संख्या अधिक होगी।
अधिकांश विकासशील देशों में स्त्रियों के सामाजिक स्तर के नीचा होने के परिणाम स्वरूप मातृत्व संकट अधिक होने के कारण स्त्री मृत्यु दर अधिक होती है। इस प्रकार के देशों में स्त्रियों की संख्या पुरूषों की तुलना में कम होगी तथा लिंगानुपात अधिक होगा।
लम्बे युद्ध के परिणामस्वरूप पुरूषों के रणभूमि में शहीद हो जाने के कारण लिंगानुपात कम हो जाता है। इसी प्रकार का असन्तुलन अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास के कारण भी उत्पन्न होता है। इसका कारण यह हे कि अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास में पुरूषों की संख्या अधिक होती है। इसके अतिरिक्त, आन्तरिक प्रवास में भी पुरूषों की संख्या अधिक होती है।
भारत देश में पुरूषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या कम है जिसके अनेक कारण है: जैसे जन-स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, स्वच्छता का अभाव, शिक्षा की कमी, अज्ञानता तथा गरीबी, लड़कियों तथा स्त्रियों को पौष्टिक आहार की कमी, पुत्रों को अधिक जन्म देने की जैविक क्षमता तथा कुछ जातियों में लड़कियों को जन्म के समय ही मार डालने की प्रथा आदि।
डेविड एम. हीर ने लिंगानुपात में असन्तुलन के तीन कारणों का उल्लेख किया है प्रथम युद्ध - इसमें पुरूषों की एक बड़ी संख्या समाप्त हो जाती है, द्वितीय प्रवास - इसमें राजनीतिक, सामाजिक अथवा प्राकृतिक कारणों के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर प्रवास के कारण लिंगानुपात बदल जाता है तथा तृतीय स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण - जिस समाज में स्त्रियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है वहाँ लड़कियों के जन्म को कम पंजीकृत किया जाता है।
स्त्री पुरूष अनुपात प्रति हजार पुरूषों पर महिलाओं की संख्या है। आदर्श स्त्री पुरूष अनुपात एक हजार है। जिसका अर्थ है की जनसंख्या में महिलाओं तथा पुरूषों की संख्या बराबर बराबर है। छत्तीसगढ़, केरल तथा पाण्डिचेरी के बाद देश का तीसरा ऐसा राज्य है। जहाँ स्त्री-पुरूष अनुपात सबसे अधिक है। पड़ोसी राज्यों से स्त्री-पुरूष अनुपात से तुलना करने पर पाया जाता है कि छत्तीसगढ़ राज्य का स्त्री-पुरूष अनुपात अपने सभी पड़ोसी राज्यों, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, बिहार, महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश से अधिक है। वर्ष 2001 की तुलना में जहाँ देश का स्त्री-पुरूष अनुपात 933 से बढ़कर वर्ष 2011 की जनगणना में 940 हो गया वही छत्तीसगढ़ का स्त्री पुरूष का अनुपात अपने 1991 के स्तर 985 से बढ़कर 2011 में 991 हुआ है। अतः राज्य के किसी भी जिले का स्त्री पुरूष अनुपात देश के स्त्री पुरूष अनुपात से कम नहीं है। भारत, छत्तीसगढ़ एवं उसके जिलों का स्त्री-पुरूष अनुपात तालिका में प्रस्तुत किया गया है।
छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में स्त्री-पुरूष अनुपात में विभिन्नता पाई गई है। वर्ष 2001 एवं 2011 दोनों ही अवधियों में जिलानुसार स्त्री-पुरूष अनुपात में विचरण अत्यधिक कम रहा।
जनसंख्या का व्यावसायिक वितरण तथा आर्थिक विकास:
जनसंख्या का व्यावसायिक वितरण एवं आर्थिक विकास के मध्य गहरा संबंध होता है। जनसंख्या के व्यावसायिक विभाजन के आधार पर किसी देश की आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन किया जा सकता है। प्रो. ए.जी.बी. फिशर के अनुसार प्रगतिशील अर्थव्यवस्था में रोजगार तथा विनियोग की मात्रा लगातार प्राथमिक क्रियाओं से हटकर द्वितीयक क्रियाओं में तथा आगे चलकर तृतीयक क्रियाओं में कार्यरत् पाए जाते है।
आर्थिक विकास के प्रारम्भिक चरण में किसी देश की कुल जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग प्राथमिक क्षेत्र अर्थात् कृषि पर निर्भर करता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित है।
(1) अल्पविकसित एवं पिछड़े देशों में खाद्यान्न का उत्पादन कम होता है, इसलिए अधिकांश जनसंख्या भोजन की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कृषि कार्य में संलग्न रहने के लिए विवश होती है।
(2) अल्पविकसित देशों में प्रायः पक्के माल अर्थात् निर्मित वस्तुओं का आयात होता है। इन आयातों के भुगतान के लिए इन देशों को कृषि जन्य वस्तुओं एवं खनिज पदार्थों अर्थात् कच्चे माल का निर्यात करना पड़ता है। इस कारण जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक क्षेत्रों में ही लगा रहता है।
(3) विकास की प्रारम्भिक अवस्था में अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में विकास अल्प ही रहता है, जिससे इन क्षेत्रों में रोजगार की सम्भावनाएं कम रहती है। अतः विवश होकर लोगों को आजीविका के लिए कृषि पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
परन्तु जैसे जैसे आर्थिक विकास की प्रक्रिया तेज होती जाती है। लोगों की आय बढ़ने लगती है, जिससे निर्मित वस्तुओं की मांग में वृद्धि होने लगती है। इससे उद्योगों का विस्तार होता है और वहां रोजगार के अवसर बढ़ जाते है। निर्माण क्षेत्र की उन्नति के साथ-साथ बीमा, बैकिंग एवं परिवहन आदि क्षेत्रों का भी तेजी से विस्तार होने लगता है। इस तरह जैसे-जैसे आर्थिक विकास की गति तेज होने लगती है। वैसे-वैसे श्रमिक प्राथमिक क्षेत्र से निकलकर द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र की ओर पलायन करने लगता है। फलस्वरूप इन क्षेत्रों में कार्यशील जनसंख्या का अनुपात बढ़ने लगता है। इन क्षेत्रों की ओर श्रमिकों के पलायन के कुछ अन्य कारण भी है, यथा संगठित क्षेत्र में मजदूरी की दरों का अधिक होना तथा नगरों में रहने का आकर्षण आदि। अल्पविकसित देशों में प्राथमिक क्षेत्र के द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों की ओर पलायन की गति बहुत धीमी होती है, क्योंकि इन अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी की कमी से औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र का विस्तार मंद गति से होता है।
REFRENCES:
1. Agrawal, S.N.: "India's Population Problems" (II ed.) Tata Mc Graw Hill, New Delhi, 1977.
2. Ali, Syed Ashfaq:"Population Growth and Economic Development of Madhya Pradesh in the Light of 1971 Census" Jai Bharat Publishing House, Bhopal, 1978 P. 171-183.
3. Amestey, Vera:"Economic Development of India" London, 1952.
4. Barclay, G.W.: "Techniques of Population Analysis", John, Wiley & Son's, New York, 1958.
5. Berry, B.J.L.: "Essays on Geography & Economic Development", 1960, P. 81.
6. Bhattacharjee, P.T.:"Population in India - A Study of inter State & G.N. Shastri Variations", New Delhi, 1976.
Received on 04.11.2018 Modified on 18.11.2018
Accepted on 08.01.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):207-210.